Shighrapatan Ke Karan Lakshan Aur Upchar

Shighrapatan Ke Karan Lakshan Aur Upchar

शीघ्रपतन के कारण, लक्षण और उपचार

शीघ्रपतन-

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परिचय- जिस संभोग के बाद नायक-नायिका दोनों ही शांति-सन्तोष और आनंद का अनुभव करें, वस्तुतः वही सफल संभोग है। इसके विपरीत यदि एक पक्ष दूसरे से पहले स्खलित हो जाये तो दोनों को समान रूप से आनंद प्राप्त नहीं होता, जिसे सफल संभोग नहीं कहा जाता है। सामान्यतः पुरूष, स्त्री से पहले स्खलित हो जाते हैं। वीर्य का पतन शीघ्र हो जाता है। यदि पति के स्खलन के बाद ही पत्नी भी स्खलित हो जाये तो स्त्री संतुष्ट हो जाती है, लेकिन दोनों के बीच स्खलन का अन्तराल अधिक हो तो स्त्री प्रायः दुखी होती है।

अतः स्पष्ट है कि उत्तमोत्तम संभोग वही है, जिसमें नायक-नायिका एक साथ स्खलित हो। परन्तु ऐसा संभोग तभी संभव होता है, जब पुरूष में धारणक्षमता(स्तम्भनशक्ति) भरपूर हो जोकि 10 से 20 प्रतिशत पुरूषों में होती है। यदि स्त्री के स्खलन के तुरन्त बाद पुरूष स्खलित होता है तो स्त्री संतुष्ट हो जाती है। परन्तु अपने से पहले पति का स्खलन होना, स्त्री कभी पसंद नहीं करती है।

इस प्रकार यदि स्त्री से पहले पति का स्खलित हो जाना ‘शीघ्रपतन’ कहलाता है।

शीघ्रपतन के ये लक्षण हो सकते हैं जैसे-

1. संभोग करते समय नायिका से पहले स्खलित हो जाना।

2. योनि में लिंग प्रवेश करते ही या 2-4 घर्षण करते ही वीर्य निकल जाना।

3. जब उत्तेजित लिंग, योनि द्वार तक जाता है, तभी वीर्यपात हो जाना।

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4. आलिंगन, कामक्रीड़ा करते ही या संभोग प्रारम्भ करने से पहले ही वीर्य का निकल जाना।

5. संभोग की कल्पना करते ही किसी किये गये संभोग का स्मरण करते ही शुक्रपात हो जाना।

6. पत्नी के गुप्तांगों के वस्त्रों आदि को देखने से भी स्खलित हो जाना।

7. अश्लील चित्र या बातचीत से भी वीर्यपात हो जाना आदि ‘शीघ्रपतन’ के ही लक्षण हैं।
इनमें से क्रमशः प्रथम से अंत के लक्षण प्रकट होते हैं और यह तभी होता है, जब प्रथम लक्षण प्रकट होने पर ध्यान नहीं दिया जाता या चिकित्सा नहीं की जाती है। यदि प्रथम चरण में ही उचित चिकित्सा की जाये तो रोग आगे नहीं बढ़ता और समस्या का समाधान आसानी से हो जाता है।

शीघ्रपतन के प्रमुख कारण-

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1. असंयमित मैथुन-(अति मैथुन) जिसमें वीर्य का भण्डारण ही नहीं होता और वीर्य पतला हो जाता है। परिणामत क्षणिक उत्तेजना से ही पतला वीर्य निकल जाता है।

2. अप्राकृतिक मैथुन- हस्तमैथुन का रोगी बार-बार अपने हाथों से वीर्य को नष्ट करता रहता है। हस्तमैथुन के बाद ही ग्लानि से ग्रसित होकर पश्चाताप भी करता है, लेकिन पुनः एकांत स्थान पाते ही हस्तमैथुन करने से नहीं चूकता है। इस प्रकार बराबर यह क्रम चलता रहता है। रोगी वीर्य को नष्ट करते-करते ‘शीघ्रपतन’ का शिकार हो जाता है।

3. लिंग- शिश्न की विकृति भी महत्वपूर्ण कारण है। अप्राकृतिक या प्राकृतिक अति मैथुन के कारण लिंग का ढीला हो जाना, पतला, शिथिल या टेढ़ा हो जाना आदि भी इस रोग के कारण हैं। क्योंकि ये तमाम लक्षण लैंगिक दुर्बलताओं को प्रकट करते हैं, जोकि अति मैथुन का सूचक और वीर्य के पतलापन का संकेत भी है।

4. अति संभोग- अधिक संभोग से भी शिश्न की उत्थान शक्ति कमजोर हो जाती है और लिंग में कड़ापन आता ही नहीं है। यदि कड़ापन आता भी है तो क्षणिक और पतले वीर्य की कुछ बूंदे निकल जाती है और लिंग शिथिल होकर ढीला पड़ जाता है।

5. ध्वजभंग- नपुंसकता का रोगी संभोग नहीं कर पाता है। यदि करने का प्रयास भी करता है तो शीघ्र स्खलित होकर स्त्री के सामने लज्जित होकर अलग हो जाता है।

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6. अश्लील वातावरण में रहना- अश्लील चित्र या चलचित्र देखना, अश्लील साहित्य पढ़ना, अकेले में लिंग को देखना, अश्लील घटनाओं का बारबार स्मरण करना, पशु-पक्षियों को मैथुन करते बार-बार देखना आदि से प्रभावित होकर रोगी वीर्य क्षीण करता है, जिससे रोगी पहले शीघ्रपतन का शिकार होता है और बाद में नपुंसकता का शिकार हो जाता है।

7. संभोग नहीं करना- कभी-कभी लंबे समय तक पुरूष संभोग कर नहीं पाता, परदे या पत्नी से दूर रहने के कारण या किसी अन्य कारणों से तो पुनः प्रथम संभोग समय अक्सर पुरूष शीघ्र स्खलित हो जाता है। वह धीरे-धीरे स्वतः ठीक हो जाता है, यदि अन्यान्य कारणों को उत्पन्न होने का अवसर नहीं दिया जाये।

8. डर या भय- लुके-छिपे, चोरी से संभोग करते समय किसी के देख लेने के भय से संभोग काल में शीघ्र स्खलन हो जाता है। इस प्रकार का ‘शीघ्र स्खलन’ परिस्थितिजन्य होता है, जो परिस्थिति के अनुकूल स्थिति में स्वतः ठीक हो जाता है।

9. अधिक खटाई खाना- अधिक खटाई खाने से, गर्भ के बाद तुरन्त ठंडा या ठंडे के बाद तुरन्त गरम खाद्य या पेय लेने अथवा बासी आहार बराबर लेने से धीरे-धीरे रोगी शीघ्र स्खलन का शिकार हो जाता है।

10. नशा करना- यद्यपि कोई भी नशा संभोग क्षमता की दृष्टि से हितकारी नहीं है। इनमें भी शराब अति हानिकारक है, क्योंकि इनके सेवन से शुक्रकीटों का नाश हो जाता है और शीघ्र स्खलन जैसे कई रोग हो जाते हैं।

शीघ्रपतन का आयुर्वेदिक उपचार-

1.) 50 ग्राम तालमखाना के बीज लें और इसे अदरक के रस में लगभग आधा घंटे तक भिगो कर रखने के बाद अच्छे से सुखाएं। ऐसा तीन बार करें। अब इनका चूर्ण बना लें। इस तैयार चूर्ण को 200 ग्राम शहद में भली-भांति मिश्रण करके एक साफ शीशी में भर कर रख लें। आपकी शीघ्र स्खलन की समस्या की दवा तैयार है। इस दवा की 10 ग्राम मात्रा गाय के दूध के साथ सुबह व शाम को लेने से शीघ्र स्खलन की समस्या में लाभ होता है।

2.) शीघ्र स्खलन रोग को समाप्त करने के लिए 3 ग्राम सतावर का चूर्ण मिश्री मिला दूध के साथ सेवन करते रहें। चमत्कारी लाभ होता है।

3.) तुलसी के 3 ग्राम बीज और 5 पत्ते, नागर वेल के पान में मिलाकर अच्छे से चबाकर खाने से पूर्व स्खलन की परेशानी समाप्त हो जाती है।

4.) शीघ्र स्खलन रोग पर नियंत्रण पाने के लिए असगंध और सतावर चूर्ण 3-3 ग्राम सुबह-शाम दूध के साथ लेते रहें, शीघ्र लाभ होगा।

5.) कामिनी विद्रावण रस – प्रतिमात्रा 1 गोली रात में मिश्री मिले शुष्म दूध के साथ नित्य दें। यह वीर्य का गाढ़ा करके स्तम्भन शक्ति बढ़ाती है।

6.) वंग भस्म – प्रतिमात्रा 125 से 250 मि.ग्रा. नित्य दो बार मिश्री मिले मक्खन या मलाई के साथ दें।

7.) बसन्तकुसुमाकर रस 1 गोली सुबह-शाम मिश्री मिले दूध या मक्खन मिश्री के साथ सेवन करायें।

8.) मकरध्वज 125 मि.ग्रा., एक ग्राम कौंच के बीज चूर्ण या असगंध चूर्ण के साथ शहद में मिलाकर नित्य दो बार सेवन करायें।

9.) अकरकरा, दालचीनी, लौंग, कपूर, केशर और जायफल का मिश्रित चूर्ण 1 ग्राम और मकरध्वज 125 मि.ग्रा. एक साथ घोटकर गर्म जल के साथ नित्य सुबह-शाम दें।

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केवल पुरूषों के लिए हिंदी में ब्लाॅग, जानिए शीघ्रपतन क्यों होता है? Shighrapatan Ke Karan, Lakshan Aur Upchar
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Chetan Anmol Sukh
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